Friday, 24 June 2011
Monday, 13 June 2011
शकुंतला की अंगूठी !
दुष्यंत,
तुम फिर आ गये |
क्यों तुम मेरे दरवाज़े पर दस्तक देते हो ?
मेरे पास तुम्हारी
अंगूठी नहीं है |
और
अब मै तुम्हारी अंगूठी के सहारे
अपनी पहचान नहीं बनाना चाहती |
अब मै स्वयं
अपनी पहचान बनाना चाहती हूँ |
और
मेरी पहचान से ही
तुम निरंतर चलते समय मे
पहचाने जाओगे |
दुष्यंत
तुम अपनी पहचान खो चुके हो |
दुष्यंत
तुम राजा हो
और राजा प्रश्न चिन्हों से घिरा होता है |
संवेदनहीन होता है |
तुम राजा हो
इंसान नहीं |
मै तो बनवासी थी ,
मेरा कसूर क्या था ?
जंगल मे भटके हुए दुष्यंत से प्रेम करना.... ?
परंतु तुमने तो
अपने जाल मे फसाकर
मुझे ठग लिया
एक अंगूठी देकर |
आज भी शकुंतला
अंगूठी पहनाकर ही ठगी जाती है |
पुरुष हो ना
स्त्री तुम्हारे लिए भोग की वस्तु है |
तुम जैसे पुर्षों के लिए स्त्री
गुड़िया ही होती है ,
गुड़िया
खेलने और तोड़ने के लिए |
बार- बार क्यों दस्तक देते हो ?
अब तुम जाओ
तुम्हारे जाल मे फँसकर अब मै खोना नहीं चाहती |
फसना नहीं चाहती,
मिटना नहीं चाहती,
दुष्यंत
अब मै सारे बंधनो से मुक्त होकर
आकाश की
ऊंचाइयों को छूना चाहती हूँ |
ऊंची
और ऊंची
और ऊंची
उड़ान भरना चाहती हूँ |
मुक्त होकर सांस लेना चाहती हूँ |
जुगल |
तुम फिर आ गये |
क्यों तुम मेरे दरवाज़े पर दस्तक देते हो ?
मेरे पास तुम्हारी
अंगूठी नहीं है |
और
अब मै तुम्हारी अंगूठी के सहारे
अपनी पहचान नहीं बनाना चाहती |
अब मै स्वयं
अपनी पहचान बनाना चाहती हूँ |
और
मेरी पहचान से ही
तुम निरंतर चलते समय मे
पहचाने जाओगे |
दुष्यंत
तुम अपनी पहचान खो चुके हो |
दुष्यंत
तुम राजा हो
और राजा प्रश्न चिन्हों से घिरा होता है |
संवेदनहीन होता है |
तुम राजा हो
इंसान नहीं |
मै तो बनवासी थी ,
मेरा कसूर क्या था ?
जंगल मे भटके हुए दुष्यंत से प्रेम करना.... ?
परंतु तुमने तो
अपने जाल मे फसाकर
मुझे ठग लिया
एक अंगूठी देकर |
आज भी शकुंतला
अंगूठी पहनाकर ही ठगी जाती है |
पुरुष हो ना
स्त्री तुम्हारे लिए भोग की वस्तु है |
तुम जैसे पुर्षों के लिए स्त्री
गुड़िया ही होती है ,
गुड़िया
खेलने और तोड़ने के लिए |
बार- बार क्यों दस्तक देते हो ?
अब तुम जाओ
तुम्हारे जाल मे फँसकर अब मै खोना नहीं चाहती |
फसना नहीं चाहती,
मिटना नहीं चाहती,
दुष्यंत
अब मै सारे बंधनो से मुक्त होकर
आकाश की
ऊंचाइयों को छूना चाहती हूँ |
ऊंची
और ऊंची
और ऊंची
उड़ान भरना चाहती हूँ |
मुक्त होकर सांस लेना चाहती हूँ |
जुगल |
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