Wednesday, 24 August 2011

ख़ुद से बात - चीत ...

दिन में ,
उलझनों के जाल सुलझाता हूँ,
और
रात कटती है
सपनों की उधेड़ बुन मे;
और
जब अकेला होता हूँ इन दोनों से
तो
उलझनों और सपनों के साझीदार
खड़े हो जाते है अपना हिसाब मांगने |

और फिर जिंदगी मे
हाथ लगता है
स्वयं के लिये बनाये मन का
एक ऐसा हिस्सा
जो थोड़ा गला और थोड़ा ठोस होता है |

हम शायद ऐसे ही मन के साथ
जीते चलते हैं |

तब तक
जब तक
हम उलझनों के जाल से
सपनों की उधेड़ - बुन से
मुक्ती नहीं पा जाते |

मुक्ती कब मिलती है ?

जब कोई मन को छूता है ,
समझता है ,
और फिर
दूर तक साथ चलता है |

साथ -साथ
चलते -चलते
ख़ुद को ढूँढने
तलाश करने मे हाथ थामता है |
फिर
थोड़ा गले और थोड़ा ठोस मन को छूता है |

तब  मन
नाचता,गाता और झूम उठता है |

पथहीन जंगल मे भी
पथ बना ही लेता है मन

उलझनों के जाल को सुलझाता है |
सपनों के कबाड़ से
सार्थक सपनों को चुनकर सजाता है |

तब जिंदगी
फिर से आरम्भ होती है |
आओ ,हम जिंदगी का अंत नहीं
जिंदगी की शुरुआत करें ,
और
तलाशे उसे
जो सार्थकता को,
सच को समझने मे ,
दूर तलक
हमारे साथ चले |

                                                                                                    जुगल ---
                                                                                                                21-8-2011


चलते -चलते