Friday, 2 December 2011

ख़ुद को तलाश करता हूँ ....

मुझे बताया गया
वो ही सब कुछ है ,
तुम कुछ भी नहीं |

मुझे बताया गया
हम उसकी मर्ज़ी के बंदे हैं ,
हमारा -अपना कुछ भी नहीं ,
सब उसका है |

इधर -उधर
उधर -इधर
भटकता रहा मै

और
ये जानने की कोशिश करता रहा
कि
वो कौन है ?
और
मै कौन हूँ ?

क्यों कि किसी ने
ये भी कहा था कि
तुम्ही सब कुछ हो |
तुम्ही सब कुछ हो |
क्यों कि
तुम रचते हो इतिहास ,
तुम रचते हो दुनिया ,
तुम करते हो निर्माण
और तुम क्या भूल गए कि
तुम करते हो सृजन |

इस भटकने  में
मैं ख़ुद को भुला बैठा था |

अपना इतिहास ही भूल बैठा था |

इसीलिए लोगो से पूछता रहा कि
मेरी शक्ल का क्या कोई व्यक्ति इधर से गुज़रा था ?
हाँ ,उसने इस सड़क पर
कई चक्कर काटे |
फिर मैं उनसे पूछता हूँ कि
कौन था वो ?
तब,उन लोगो कि भीड़ मे से
किसी ने कहा मुझ से ,
अरे ,
वो कोई और नहीं
तुम्ही तो थे |

मैंने फिर उससे पूछा
मैं कौन हूँ ?
उसने कहा ,
तुम,तुम्ही तो हो |

उसका जवाब
मेरी समझ से परे था |

सोचा ,
ख़ुद से पूछूं कि
मै कौन हूँ ?
और वो कौन है ?

जवाब मिला ,
जो दिखाई देता है
वो तुम हो |
जो नहीं दिखाई देता
वो ,वो है |

ओह !ये इक पहेली सा लगता है |

भटकता हूँ ,
इनसे-उनसे ,लोगो से
बार-बार पूछता हूँ कि
मै कौन हूँ ?

लोग चुप्पी साधे
मुझे देखते रहते हैं,
और
बस देखते रहते हैं
बोलते कुछ भी नहीं |

अपने अन्दर के मकड़जाल को काटकर
ख़ुद तक पहुँचने कि कोशिश करता हूँ |
शायद
वहाँ तक पहुँच कर
मै ये जान सकूँ कि
मै कौन हूँ ?
और
मै वो हो सकूँ ,जो मै हूँ |
और
ख़ुद तक पहुँचकर
ख़ुद से रूबरू हो सकूँ ,
ख़ुद को देख सकूँ कि
मैं हूँ क्या ?
और
मैं कौन हूँ ?

ख़ुद कि तलाश करता हूँ ....

                                                                                                    जुगल
                                                                                                         29-11-2011