Saturday, 24 September 2011

आधी तो बीत गयी ....

आधी तो बीत गयी

कहते-सुनते
सुनते-कहते
शब्दों के झमेले मे

आधी तो बीत गयी

शतरंज की बिसात पे
काले-सफ़ेद मोहरों से
पिटते-पिटाते
कभी मात देते
कभी मात खाते
हारते-हराते
जीतते-जिताते
चालें हम चलते रहे |

 अब आधी तो बीत गयी

चौसर के पासों को
हाथों में लेकर
युधिष्ठिर और शकुनि बन
ठगते-ठगाते रहे |
हारते-हराते रहे |

आधी तो यूं बीती
हाथ लगा शून्य
पर सार्थक तो कुछ भी नहीं |

सोचता
टहलता हूँ
ख़ुद से फिर पूछता हूँ
क्या करूँ ?
क्या न करूँ ?
कुछ तो बताओ मन !

शतरंज की बिसात पर
मोहरे क्या फिर लगाऊँ ?
या
चौसर के पासों से
महाभारत फिर लिखूँ ?

कुछ तो बताओ मन
आधी तो बीत गयी
हाथ लगा शून्य
पर सार्थक तो कुछ भी नहीं |

अब न तो कोई पांडव हो
जो द्रौपदी को हार जाए
और न हो  कोई कृष्णा
जो छल-कपट से युद्ध करे
और न हो कोई दुःशासन
जो द्रौपदी को नग्न करे |

शतरंज की बिसात से
काले-सफ़ेद मोहरों का खेल
अब बंद हो |
चौसर के पासों को
दूर कहीं फेंक दे |

सृजन के साक्षी बन
अपने पट खोल दें ,
और
नयी रौशनी से
ख़ुद को जगमग करें |

आओ,अब शुरू करें
सब कुछ शुरुआत से |

                                                              जुगल ---24-9-2011