Wednesday, 22 August 2012

इस शहर की सड़कें…….

 

ये शहर

बड़ा अजीब है |

इस शहर की सड़के

दूसरे शहरों को तो जाती हैं

लेकिन

वहां नहीं जाती

जहाँ से मैंने चलना शुरू किया था|

 

इन सड़कों का

कच्चे रास्तों से कोई वास्ता नहीं|

 

ये सभी सड़कें

देश की राजधानी तक जाती हैं,

और बीमार देश का हाल

कुछ ऐसे बताती है 

जैसे गाँधी का हिन्द स्वराज आ गया हो |

जैसे धूमिल के तीन थके हुए रंगों में जान आ गयी हो |

जैसे हरचरना का फटा सुथन्ना सिल गया हो |

झूठ बोलती हैं ये सड़कें |

 

इन सडकों के मकडजाल में

होरी,धनिया,गोबर,घीसू,माधव को

प्रेमचंद जिस हाल में छोड़कर गए थे

वे इक्कीसवी सदी में भी

कश्मीर से कन्याकुमारी तक

गुजरात से अरुणाचल तक

उसी हाल में हैं |

और विदर्भ में इनके हाल ….?

फिर भी राजधानी में जाकर

ये सड़कें चिल्ला-चिल्लाकर कहती हैं

कि हाल-चाल सब ठीक हैं ,

होरी,धनिया,गोबर,धीसू,माधव

राम,रहीम,अब्दुल,अफजल,कबीर,

रसखान,गरीब-गुरबा,लल्लन.कल्लन 

सब मस्त हैं,

पर वे आज कि हवावों से भी लैस हैं |

 

राजधानी के हुक्मरान ये अच्छी जानते हैं

कि वे हमारी कारगुजारिओं से वाकिफ़ हैं |

और इस मकडजाल से निकलनें के लिए

छटपटा रहें हैं और ये भी जानते हैं कि

ये सड़कें झूठ बोलती हैं |

 

हुकमतें सच और झूठ के जाल को

अपने हाथों में पकडकर ही हुकूमत करतीं हैं |

ताकि सच और झूठ के खेल को अच्छे से खेल सकें |

 

हमें खतरे उठा कर

सड़कों के मकडजाल,

सच और झूठ के खतरनाक खेल ,

सभी कुछ तोड्नें ,

नष्ट करनें,

और खत्म करने होंगे |

 

                                                            -- जुगल

                                                                              22-8-2012