Saturday, 29 September 2012
Wednesday, 22 August 2012
इस शहर की सड़कें…….
ये शहर
बड़ा अजीब है |
इस शहर की सड़के
दूसरे शहरों को तो जाती हैं
लेकिन
वहां नहीं जाती
जहाँ से मैंने चलना शुरू किया था|
इन सड़कों का
कच्चे रास्तों से कोई वास्ता नहीं|
ये सभी सड़कें
देश की राजधानी तक जाती हैं,
और बीमार देश का हाल
कुछ ऐसे बताती है
जैसे गाँधी का हिन्द स्वराज आ गया हो |
जैसे धूमिल के तीन थके हुए रंगों में जान आ गयी हो |
जैसे हरचरना का फटा सुथन्ना सिल गया हो |
झूठ बोलती हैं ये सड़कें |
इन सडकों के मकडजाल में
होरी,धनिया,गोबर,घीसू,माधव को
प्रेमचंद जिस हाल में छोड़कर गए थे
वे इक्कीसवी सदी में भी
कश्मीर से कन्याकुमारी तक
गुजरात से अरुणाचल तक
उसी हाल में हैं |
और विदर्भ में इनके हाल ….?
फिर भी राजधानी में जाकर
ये सड़कें चिल्ला-चिल्लाकर कहती हैं
कि हाल-चाल सब ठीक हैं ,
होरी,धनिया,गोबर,धीसू,माधव
राम,रहीम,अब्दुल,अफजल,कबीर,
रसखान,गरीब-गुरबा,लल्लन.कल्लन
सब मस्त हैं,
पर वे आज कि हवावों से भी लैस हैं |
राजधानी के हुक्मरान ये अच्छी जानते हैं
कि वे हमारी कारगुजारिओं से वाकिफ़ हैं |
और इस मकडजाल से निकलनें के लिए
छटपटा रहें हैं और ये भी जानते हैं कि
ये सड़कें झूठ बोलती हैं |
हुकमतें सच और झूठ के जाल को
अपने हाथों में पकडकर ही हुकूमत करतीं हैं |
ताकि सच और झूठ के खेल को अच्छे से खेल सकें |
हमें खतरे उठा कर
सड़कों के मकडजाल,
सच और झूठ के खतरनाक खेल ,
सभी कुछ तोड्नें ,
नष्ट करनें,
और खत्म करने होंगे |
-- जुगल
22-8-2012