Monday, 13 June 2011

शकुंतला की अंगूठी !

दुष्यंत,

तुम फिर आ गये |
क्यों तुम मेरे दरवाज़े पर दस्तक देते हो ?
मेरे पास तुम्हारी
अंगूठी नहीं है |

और

अब मै तुम्हारी अंगूठी के सहारे
अपनी पहचान नहीं बनाना चाहती |
अब मै स्वयं
अपनी पहचान बनाना चाहती हूँ |
और
मेरी  पहचान से ही
तुम निरंतर चलते समय मे
पहचाने जाओगे |

दुष्यंत
तुम अपनी पहचान खो चुके हो |

दुष्यंत
तुम राजा हो
और राजा प्रश्न चिन्हों से घिरा होता है |
संवेदनहीन होता है |
तुम राजा हो
इंसान नहीं |

मै तो बनवासी थी ,
मेरा कसूर क्या था ?
जंगल मे भटके हुए दुष्यंत से प्रेम करना.... ?
परंतु तुमने तो
अपने जाल मे फसाकर
मुझे ठग लिया

एक अंगूठी देकर |

आज भी शकुंतला
अंगूठी पहनाकर ही ठगी जाती है |

पुरुष हो ना
स्त्री तुम्हारे लिए भोग की वस्तु है |
तुम जैसे पुर्षों  के लिए स्त्री
गुड़िया ही होती है ,
गुड़िया
खेलने और तोड़ने  के लिए |

बार- बार क्यों दस्तक देते हो ?

अब तुम जाओ
तुम्हारे जाल मे फँसकर अब मै खोना नहीं चाहती |
फसना नहीं चाहती,
मिटना नहीं चाहती,
दुष्यंत

अब मै सारे बंधनो से मुक्त होकर
आकाश की
ऊंचाइयों को छूना चाहती हूँ |
ऊंची
और ऊंची
और  ऊंची
उड़ान भरना चाहती हूँ |

मुक्त होकर सांस लेना चाहती हूँ |

                                                    जुगल  |


                   



6 comments:

  1. Sir this is very nice (nari ke antar man ki abhivayakti ) adhunik purush samaj aur nari man .

    ReplyDelete
  2. Great take on the contemporary woman's perspective !!यदि शकुंतला आज के दौर में होती तो शायद यही कहती.. ..पर मेरा मानना है की आज के दौर में भी प्रेम में विश्वास रखने वाली औरत शकुंतला जैसी हो होती है :)
    जुगल जी आपको बहुत -बहुत बधाई एक नए दृष्टिकोण को सामने रखने के लिए.
    दिखलाने के लिए

    ReplyDelete
  3. All said and done.. today's feminists probably will kill me for saying the above !!!
    LOL

    ReplyDelete
  4. तुम फिर आ गये |
    क्यों तुम मेरे दरवाज़े पर दस्तक देते हो ?
    मेरे पास तुम्हारी
    अंगूठी नहीं है |
    ...... विमर्श की कविता ,बड़ी कविता !

    ReplyDelete