दिन में ,
उलझनों के जाल सुलझाता हूँ,
और
रात कटती है
सपनों की उधेड़ बुन मे;
और
जब अकेला होता हूँ इन दोनों से
तो
उलझनों और सपनों के साझीदार
खड़े हो जाते है अपना हिसाब मांगने |
और फिर जिंदगी मे
हाथ लगता है
स्वयं के लिये बनाये मन का
एक ऐसा हिस्सा
जो थोड़ा गला और थोड़ा ठोस होता है |
हम शायद ऐसे ही मन के साथ
जीते चलते हैं |
तब तक
जब तक
हम उलझनों के जाल से
सपनों की उधेड़ - बुन से
मुक्ती नहीं पा जाते |
मुक्ती कब मिलती है ?
जब कोई मन को छूता है ,
समझता है ,
और फिर
दूर तक साथ चलता है |
साथ -साथ
चलते -चलते
ख़ुद को ढूँढने
तलाश करने मे हाथ थामता है |
फिर
थोड़ा गले और थोड़ा ठोस मन को छूता है |
तब मन
नाचता,गाता और झूम उठता है |
पथहीन जंगल मे भी
पथ बना ही लेता है मन
उलझनों के जाल को सुलझाता है |
सपनों के कबाड़ से
सार्थक सपनों को चुनकर सजाता है |
तब जिंदगी
फिर से आरम्भ होती है |
आओ ,हम जिंदगी का अंत नहीं
जिंदगी की शुरुआत करें ,
और
तलाशे उसे
जो सार्थकता को,
सच को समझने मे ,
दूर तलक
हमारे साथ चले |
जुगल ---
21-8-2011
चलते -चलते
उलझनों के जाल सुलझाता हूँ,
और
रात कटती है
सपनों की उधेड़ बुन मे;
और
जब अकेला होता हूँ इन दोनों से
तो
उलझनों और सपनों के साझीदार
खड़े हो जाते है अपना हिसाब मांगने |
और फिर जिंदगी मे
हाथ लगता है
स्वयं के लिये बनाये मन का
एक ऐसा हिस्सा
जो थोड़ा गला और थोड़ा ठोस होता है |
हम शायद ऐसे ही मन के साथ
जीते चलते हैं |
तब तक
जब तक
हम उलझनों के जाल से
सपनों की उधेड़ - बुन से
मुक्ती नहीं पा जाते |
मुक्ती कब मिलती है ?
जब कोई मन को छूता है ,
समझता है ,
और फिर
दूर तक साथ चलता है |
साथ -साथ
चलते -चलते
ख़ुद को ढूँढने
तलाश करने मे हाथ थामता है |
फिर
थोड़ा गले और थोड़ा ठोस मन को छूता है |
तब मन
नाचता,गाता और झूम उठता है |
पथहीन जंगल मे भी
पथ बना ही लेता है मन
उलझनों के जाल को सुलझाता है |
सपनों के कबाड़ से
सार्थक सपनों को चुनकर सजाता है |
तब जिंदगी
फिर से आरम्भ होती है |
आओ ,हम जिंदगी का अंत नहीं
जिंदगी की शुरुआत करें ,
और
तलाशे उसे
जो सार्थकता को,
सच को समझने मे ,
दूर तलक
हमारे साथ चले |
जुगल ---
21-8-2011
चलते -चलते
'आओ ,हम जिंदगी का अंत नहीं
ReplyDeleteजिंदगी की शुरुआत करें ,
और
तलाशे उसे
जो सार्थकता को,
सच को समझने मे ,
दूर तलक
हमारे साथ चले' |
................सुंदर और सहज अभिव्यक्ति के लिए बधाई आपको !!!
जुगल जी
ReplyDeleteमुझे लगता है आपकी यात्रा बहुत लम्बी होने वाली है.
क्यूंकि कौन आपके मन की बात समझेगा, कौन आपको सच से एक बार फिर(?) मिलवायेगा ?
मन के कोने में जो थोड़े से सार्थक हो गए और जो कुछ यूँही छूट गए - उन सपनो को साथ लेकर चलते रहिये,
कि ठोस हो या गला हुआ कि यदि मन के साथ न चलें, मन में उलझने न रहें तो जीवित होने का आभास भी मिट जायेगा
आपकी उलझने और सपनो के साझीदार - दोनों सलामत रहें :)
Regards
kanak