आधी तो बीत गयी
कहते-सुनते
सुनते-कहते
शब्दों के झमेले मे
आधी तो बीत गयी
शतरंज की बिसात पे
काले-सफ़ेद मोहरों से
पिटते-पिटाते
कभी मात देते
कभी मात खाते
हारते-हराते
जीतते-जिताते
चालें हम चलते रहे |
अब आधी तो बीत गयी
चौसर के पासों को
हाथों में लेकर
युधिष्ठिर और शकुनि बन
ठगते-ठगाते रहे |
हारते-हराते रहे |
आधी तो यूं बीती
हाथ लगा शून्य
पर सार्थक तो कुछ भी नहीं |
सोचता
टहलता हूँ
ख़ुद से फिर पूछता हूँ
क्या करूँ ?
क्या न करूँ ?
कुछ तो बताओ मन !
शतरंज की बिसात पर
मोहरे क्या फिर लगाऊँ ?
या
चौसर के पासों से
महाभारत फिर लिखूँ ?
कुछ तो बताओ मन
आधी तो बीत गयी
हाथ लगा शून्य
पर सार्थक तो कुछ भी नहीं |
अब न तो कोई पांडव हो
जो द्रौपदी को हार जाए
और न हो कोई कृष्णा
जो छल-कपट से युद्ध करे
और न हो कोई दुःशासन
जो द्रौपदी को नग्न करे |
शतरंज की बिसात से
काले-सफ़ेद मोहरों का खेल
अब बंद हो |
चौसर के पासों को
दूर कहीं फेंक दे |
सृजन के साक्षी बन
अपने पट खोल दें ,
और
नयी रौशनी से
ख़ुद को जगमग करें |
आओ,अब शुरू करें
सब कुछ शुरुआत से |
जुगल ---24-9-2011
कहते-सुनते
सुनते-कहते
शब्दों के झमेले मे
आधी तो बीत गयी
शतरंज की बिसात पे
काले-सफ़ेद मोहरों से
पिटते-पिटाते
कभी मात देते
कभी मात खाते
हारते-हराते
जीतते-जिताते
चालें हम चलते रहे |
अब आधी तो बीत गयी
चौसर के पासों को
हाथों में लेकर
युधिष्ठिर और शकुनि बन
ठगते-ठगाते रहे |
हारते-हराते रहे |
आधी तो यूं बीती
हाथ लगा शून्य
पर सार्थक तो कुछ भी नहीं |
सोचता
टहलता हूँ
ख़ुद से फिर पूछता हूँ
क्या करूँ ?
क्या न करूँ ?
कुछ तो बताओ मन !
शतरंज की बिसात पर
मोहरे क्या फिर लगाऊँ ?
या
चौसर के पासों से
महाभारत फिर लिखूँ ?
कुछ तो बताओ मन
आधी तो बीत गयी
हाथ लगा शून्य
पर सार्थक तो कुछ भी नहीं |
अब न तो कोई पांडव हो
जो द्रौपदी को हार जाए
और न हो कोई कृष्णा
जो छल-कपट से युद्ध करे
और न हो कोई दुःशासन
जो द्रौपदी को नग्न करे |
शतरंज की बिसात से
काले-सफ़ेद मोहरों का खेल
अब बंद हो |
चौसर के पासों को
दूर कहीं फेंक दे |
सृजन के साक्षी बन
अपने पट खोल दें ,
और
नयी रौशनी से
ख़ुद को जगमग करें |
आओ,अब शुरू करें
सब कुछ शुरुआत से |
जुगल ---24-9-2011
"सृजन के साक्षी बन
ReplyDeleteअपने पट खोल दें ,
और
नयी रौशनी से
ख़ुद को जगमग करें |
आओ,अब शुरू करें
सब कुछ शुरुआत से |
!!!!!!!!!!!!!!!!!!लाजवाब !!! बधाई आपको !!!!!!
समय बलवान ही नहीं कठोर भी होता है, जब आधी बीत जाती है, तभी यह बोध करता है कि जो आधी बची है उसे छल कपट से नहीं प्रेम से जियें.
ReplyDeleteयह बोध ही नव- सृजन है.
जुगल जी, वैसे अभी आपकी उम्र नहीं इस 'बोध' के आभास होने का :)) अभी तो आपको कई नाटक/फ़िल्में करनी हैं !!! कैलाश अभी बहुत दूर है
Nice introspection,
regds
kanak