ये हवाएँ
कुछ अलग हैं ,
न गर्म,
न ठंडी,
कुछ नर्म हैं |
जिस्म को छूकर
रूह तक उतर जाती हैं
और लिपट जाती हैं
कुछ इस तरह
जैसे चाँद से उतर कर
चाँदनी लिपट जाती है
और
तुम्हारे होने का एहसास कराती हैं |
ये एहसास मुझे
इक नगमा सा लगता है ,
जो पहाड़ों की हसीन वादियों मे ,
हवा के साथ
फिज़ा में तैरता रहता है ,
जिसे केवल सुनने
.....और सुनने का मन करता है |
हाँ ,सुनो ,
इक बात ख़ास...
इन एहसासों की भीड़ में
इन नगमों के जमघट में
मैं ख़ुद को अकेला पाता हूँ
और
तब सब कुछ मेरी समझ से परे होता है ,
और फिर मैं सोचता हूँ
ये तुम हो
या कोई और |
मैं तुम्हारे होने और न होने के जाल मे फस जाता हूँ
और फिर लगता है की मैं तुम्ही से पूछूं
कि कौन हो तुम !
छलना हो !
दिखती तो हो पर पकड़ नहीं आती
माया हो !
हर तरफ अपने होने का एहसास कराती हो
तितली हो !
जो इधर -उधर फूलों पर भटकती रहती है
जल हो !
जिसे हाथों मे भर नहीं सकता
हवा हो !
जिसे हाथों से पकड़ नहीं सकता
एहसास हो !
जिसे छू नहीं सकता (महसूस कर सकता हूँ )
नगमा हो !
जिसे गुनगुना नहीं सकता (बस सुन सकता हूँ )
मुझमें हो !
जिसे देख नहीं सकता
या ....
नहीं हो !
ऐसा लगता तो नहीं
या...
सब कुछ हो !
सोच कर खुश हो जाता हूँ
नहीं
शायद,तुम इक तिलस्म हो
और फिर लगता है ,
शायद,तुम ,तुम नहीं कुछ और हो
हाँ, शायद भ्रम|
ये छटपटाहट तुम्हें लेकर क्यूँ है मेरे भीतर
कहीं तुम मोहब्बत तो नहीं
पर...
मोहब्बत मे तो मिलना लाज़मी है
लेकिन
तुम मिलती भी तो नहीं हो,
केवल अपने होने का एहसास कराती हो
उफ़!मेरी समझ से परे हो |
हाँ ;जब मैं बंद आँखों से तुम्हें देखता हूँ
तो तुम मुझे आसमान से उतरती
नूर सी लगती हो ,
जो आहिस्ता - आहिस्ता मुझ में उतर जाती है ,
उफ़!मुझे तुम इश्क़ का एहसास लगती हो |
हाँ ,तुम कुछ भी नहीं ,
बस इश्क़ हो |
इसीलिए तुम मुझमें समाती हो
और
मैं
तुममें समा जाने का इंतज़ार कर रहा हूँ |
हाँ,तुम कुछ भी नहीं
तुम इश्क़ हो ,
इश्क़ |...
जुगल
17-10 2011
केवल अपने होने का
मोहब्बत मे तो मिलना लाज़मी है
लेकिन ,
कुछ अलग हैं ,
न गर्म,
न ठंडी,
कुछ नर्म हैं |
जिस्म को छूकर
रूह तक उतर जाती हैं
और लिपट जाती हैं
कुछ इस तरह
जैसे चाँद से उतर कर
चाँदनी लिपट जाती है
और
तुम्हारे होने का एहसास कराती हैं |
ये एहसास मुझे
इक नगमा सा लगता है ,
जो पहाड़ों की हसीन वादियों मे ,
हवा के साथ
फिज़ा में तैरता रहता है ,
जिसे केवल सुनने
.....और सुनने का मन करता है |
हाँ ,सुनो ,
इक बात ख़ास...
इन एहसासों की भीड़ में
इन नगमों के जमघट में
मैं ख़ुद को अकेला पाता हूँ
और
तब सब कुछ मेरी समझ से परे होता है ,
और फिर मैं सोचता हूँ
ये तुम हो
या कोई और |
मैं तुम्हारे होने और न होने के जाल मे फस जाता हूँ
और फिर लगता है की मैं तुम्ही से पूछूं
कि कौन हो तुम !
छलना हो !
दिखती तो हो पर पकड़ नहीं आती
माया हो !
हर तरफ अपने होने का एहसास कराती हो
तितली हो !
जो इधर -उधर फूलों पर भटकती रहती है
जल हो !
जिसे हाथों मे भर नहीं सकता
हवा हो !
जिसे हाथों से पकड़ नहीं सकता
एहसास हो !
जिसे छू नहीं सकता (महसूस कर सकता हूँ )
नगमा हो !
जिसे गुनगुना नहीं सकता (बस सुन सकता हूँ )
मुझमें हो !
जिसे देख नहीं सकता
या ....
नहीं हो !
ऐसा लगता तो नहीं
या...
सब कुछ हो !
सोच कर खुश हो जाता हूँ
नहीं
शायद,तुम इक तिलस्म हो
और फिर लगता है ,
शायद,तुम ,तुम नहीं कुछ और हो
हाँ, शायद भ्रम|
ये छटपटाहट तुम्हें लेकर क्यूँ है मेरे भीतर
कहीं तुम मोहब्बत तो नहीं
पर...
मोहब्बत मे तो मिलना लाज़मी है
लेकिन
तुम मिलती भी तो नहीं हो,
केवल अपने होने का एहसास कराती हो
उफ़!मेरी समझ से परे हो |
हाँ ;जब मैं बंद आँखों से तुम्हें देखता हूँ
तो तुम मुझे आसमान से उतरती
नूर सी लगती हो ,
जो आहिस्ता - आहिस्ता मुझ में उतर जाती है ,
उफ़!मुझे तुम इश्क़ का एहसास लगती हो |
हाँ ,तुम कुछ भी नहीं ,
बस इश्क़ हो |
इसीलिए तुम मुझमें समाती हो
और
मैं
तुममें समा जाने का इंतज़ार कर रहा हूँ |
हाँ,तुम कुछ भी नहीं
तुम इश्क़ हो ,
इश्क़ |...
जुगल
17-10 2011
केवल अपने होने का
मोहब्बत मे तो मिलना लाज़मी है
लेकिन ,
beautiful composition..
ReplyDelete"ये एहसास मुझे
ReplyDeleteइक नगमा सा लगता है ,
जो पहाड़ों की हसीन वादियों मे ,
हवा के साथ
फिज़ा में तैरता रहता है ,
जिसे केवल सुनने
.....और सुनने का मन करता है!!"
अशोक अरोरा..
ReplyDeleteमैं तुम्हारे होने और न होने के जाल मे फस जाता हूँ
और फिर लगता है की मैं तुम्ही से पूछूं
कि कौन हो तुम !..........जो आहिस्ता - आहिस्ता मुझ में उतर जाती है ,उफ़!मुझे तुम इश्क़ का एहसास लगती हो |
....जुगल जी एक..बेहतरीन..रचना......
तु मुझ मे समा जा, मैँ तुझ मे समा जाऊँ
एक हो जायेँ हम..अमर हो जाये इश्क़ तेरा मेरा....
यदि किसी को समझाना है कि इश्क क्या है तो बस इन पंक्तियों को पढ़ ले,यह खूबसूरत एहसास ख़ुद ब ख़ुद समझ आ जायेगा.
ReplyDeleteकिसी के आस-पास होने का एहसास ही मोहोब्बत है ~
ReplyDelete" तुम मिलती भी तो नहीं हो,
केवल अपने होने का एहसास कराती हो
उफ़!मेरी समझ से परे हो | "
मेरे नामुराद जूनून का है इलाज कोई तो मौत है
जो दावा के नाम पे ज़हर दे ...
जुगल जी, आपकी कविता ने साहिर की याद दिला दी
खुबसूरत पेशकश !