Saturday, 30 April 2011

लखनऊ के दो रंग --२

मुझसे सुबहों -शाम शिकवा कर रहा है लखनऊ
देख तुझमे धीरे-धीरे भर रहा है लखनऊ

जितने हम प्याला थे उठते जा रहें हैं बज्म से
आखिरी पैमाना अपना भर रहा है लखनऊ

बढ़ रहा है रोज बे आहंग आवाजों का शोर
आने वाली साअतो से डर रहा है लखनऊ

ऐसी  शामें भी यहाँ पिछले दिनों गुज़री हैं जब
इन्तिजारे - सुबह में शब् भर रहा है लखनऊ

वाज़दारी ये कि हिजरत करने वालों के लिए
एक मुद्दत तक ब चश्म-ए-तर रहा है लखनऊ

शुक्र कर वाली तेरी मिटटी ठिकाने लग गई
तू जो कूज़ा है तो कूज़ा गर रहा है लखनऊ
                                                            --------वाली आसी


                                              

Wednesday, 20 April 2011

YE HAWAAYEN.....

ये हवाएँ
हमे बात नहीं करने देती  
हमारे-तुम्हारे बीच आकर 
अपने किस्से -कहानियां 
सुनाती हैं |
ये हवाएँ 
फिजा में तैरते 
उन  तमाम गीतों के 
तराने छेड़ती हैं जिनमे 
मिलन  और जुदाई के 
अफ़साने होते हैं |
ये हवाएं 
पुरानी सभ्यताओं के 
न जाने किन- किन 
लोगो से हमारी -तुम्हारी 
ख़ामोशी की चुगलियाँ करती हैं 
और 
वे सब अपने हथियारों और लांछनो से लैस होकर 
हमे घेर लेते हैं |
शायद 
इन्हें हमारी ख़ामोशी का सच हाथ लग गया |
हमने-तुमने 
इन सरसराती हवाओं के बीच कभी 
"हूँ "-"बोलो"
के सिवा कुछ कहा ही नहीं |
खामोश बस खामोश रहे हम, 
और ख़ामोशी से, 
अपने बीते  पलों के तिनके उठाते रहे|
अब  
ये हवाएं हमारे-तुम्हारे बीते  पलों के तिनके 
कहीं दूर उड़ा कर ले जाएँगी , 
बड़ी खतरनाक है 
ये हवाएं |
इन मुखालिफ और तेज़ हवाओं के बीच 
हम अपनी  मुठ्ठियाँ भीच कर उन पलों को 
जाने से रोक लें  जो हमने समय की  धरती से बटोरे थे |
शायद 
इससे ही कुछ पल कुछ समय ठहर जाये |
और 
हम इन हवाओं के बीच बात कर सके|
इन हवाओं के सारे 
गिले- शिकवे भूलकर 
इन हवाओं के बीच कुछ नए गीत ,
कुछ नए  अफ़साने गढ़ सके ,
इन हवाओं के बीच ठहरकर 
बात कर सके | 
ये हवाएं हमे बात करने देंगी |
                                                                 JUGAL