मुझसे सुबहों -शाम शिकवा कर रहा है लखनऊ
देख तुझमे धीरे-धीरे भर रहा है लखनऊ
जितने हम प्याला थे उठते जा रहें हैं बज्म से
आखिरी पैमाना अपना भर रहा है लखनऊ
बढ़ रहा है रोज बे आहंग आवाजों का शोर
आने वाली साअतो से डर रहा है लखनऊ
ऐसी शामें भी यहाँ पिछले दिनों गुज़री हैं जब
इन्तिजारे - सुबह में शब् भर रहा है लखनऊ
वाज़दारी ये कि हिजरत करने वालों के लिए
एक मुद्दत तक ब चश्म-ए-तर रहा है लखनऊ
शुक्र कर वाली तेरी मिटटी ठिकाने लग गई
तू जो कूज़ा है तो कूज़ा गर रहा है लखनऊ
--------वाली आसी
देख तुझमे धीरे-धीरे भर रहा है लखनऊ
जितने हम प्याला थे उठते जा रहें हैं बज्म से
आखिरी पैमाना अपना भर रहा है लखनऊ
बढ़ रहा है रोज बे आहंग आवाजों का शोर
आने वाली साअतो से डर रहा है लखनऊ
ऐसी शामें भी यहाँ पिछले दिनों गुज़री हैं जब
इन्तिजारे - सुबह में शब् भर रहा है लखनऊ
वाज़दारी ये कि हिजरत करने वालों के लिए
एक मुद्दत तक ब चश्म-ए-तर रहा है लखनऊ
शुक्र कर वाली तेरी मिटटी ठिकाने लग गई
तू जो कूज़ा है तो कूज़ा गर रहा है लखनऊ
--------वाली आसी
