Saturday, 30 April 2011

लखनऊ के दो रंग --२

मुझसे सुबहों -शाम शिकवा कर रहा है लखनऊ
देख तुझमे धीरे-धीरे भर रहा है लखनऊ

जितने हम प्याला थे उठते जा रहें हैं बज्म से
आखिरी पैमाना अपना भर रहा है लखनऊ

बढ़ रहा है रोज बे आहंग आवाजों का शोर
आने वाली साअतो से डर रहा है लखनऊ

ऐसी  शामें भी यहाँ पिछले दिनों गुज़री हैं जब
इन्तिजारे - सुबह में शब् भर रहा है लखनऊ

वाज़दारी ये कि हिजरत करने वालों के लिए
एक मुद्दत तक ब चश्म-ए-तर रहा है लखनऊ

शुक्र कर वाली तेरी मिटटी ठिकाने लग गई
तू जो कूज़ा है तो कूज़ा गर रहा है लखनऊ
                                                            --------वाली आसी


                                              

2 comments:

  1. इन नज्मो के दोनों रंग प्रसिद्द गायक रवि नागर ने अपनी दिलकश आवाज़ गायें हैं|

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  2. बेहद खूबसूरत गज़ल !
    .......... रवि नागर जी इस समय काफी अस्वस्थ हैं ... उनके लिए ईश्वर से प्रार्थना ...!!!

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