ये हवाएँ
हमे बात नहीं करने देती
हमारे-तुम्हारे बीच आकर
अपने किस्से -कहानियां
सुनाती हैं |
ये हवाएँ
फिजा में तैरते
उन तमाम गीतों के
तराने छेड़ती हैं जिनमे
मिलन और जुदाई के
अफ़साने होते हैं |
ये हवाएं
पुरानी सभ्यताओं के
न जाने किन- किन
लोगो से हमारी -तुम्हारी
ख़ामोशी की चुगलियाँ करती हैं
और
वे सब अपने हथियारों और लांछनो से लैस होकर
हमे घेर लेते हैं |
शायद
इन्हें हमारी ख़ामोशी का सच हाथ लग गया |
हमने-तुमने
इन सरसराती हवाओं के बीच कभी
"हूँ "-"बोलो"
के सिवा कुछ कहा ही नहीं |
खामोश बस खामोश रहे हम,
और ख़ामोशी से,
अपने बीते पलों के तिनके उठाते रहे|
अब
ये हवाएं हमारे-तुम्हारे बीते पलों के तिनके
कहीं दूर उड़ा कर ले जाएँगी ,
बड़ी खतरनाक है
ये हवाएं |
इन मुखालिफ और तेज़ हवाओं के बीच
हम अपनी मुठ्ठियाँ भीच कर उन पलों को
जाने से रोक लें जो हमने समय की धरती से बटोरे थे |
शायद
इससे ही कुछ पल कुछ समय ठहर जाये |
और
हम इन हवाओं के बीच बात कर सके|
इन हवाओं के सारे
गिले- शिकवे भूलकर
इन हवाओं के बीच कुछ नए गीत ,
कुछ नए अफ़साने गढ़ सके ,
इन हवाओं के बीच ठहरकर
बात कर सके |
ये हवाएं हमे बात करने देंगी |
JUGAL
''लोगो से हमारी -तुम्हारी
ReplyDeleteख़ामोशी की चुगलियाँ करती हैं''
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!