अब अपशकुन
बहुत होने लगे हैं इस जंगल में ,
रोने-सिसकने कि आवाजों से
जंगल सहमा-सहमा रहता है |
अटखेलियां करने वाले वृक्ष भी डरे हैं ,
किसी अनहोनी कि आशंका से
नदी भी चुप और उदास रहती है |
जंगल के सभी जीव-निर्जीव जीव
आपस में बतियाते है ,
कंकड ,पत्थर ,ईटों से सजे-धजे जंगलो से
मशीनों की आवाज़े,
आदमियों के बूटों की आवाज़ों आती हैं |
इन आदमियों के सर पर हेलमेट
और हाथों में भयानक औज़ार हैं,
ये सधे क़दमों से बढते आते हैं
हमारी ओर|
जंगल में सब आपस में पूछ्तें हैं
मित्रों,ये कौन सी सभ्यता के लोग हैं |
इन्होने उधर के जंगल खदेर दिए
उजाड दिये,
जहाँ भोर का सूरज पेडों से छनकर
धरती पर पड़ता था,
सूरज का सारा ताप वृक्ष सोख लेते थे ,
जहाँ सूरज का साम्रज्य बस नहीं पाया था ,
आज वहाँ सूरज का राज है |
आदमी तिलमिलाता है
सूरज की मार से
फिर भी जंगल को भगाता है ,
वृक्षों को भगाता है ,
जंगल से हर उस चीज़ को भगाता है ,
जो आदमी को सुख देती है ,
मित्रों ,ये कौन सी सभ्यता के लोग है |
लो ,
इन्होने घेर लिया हमें
मिटाने
उजाड़ने,
भगाने,
हमारे रिश्तों को खत्म करने ,
मित्रों ,ये कौन सी सभ्यता के लोग है |
जिन्हें ये भी नहीं मालूम
एक वृक्ष के गिरने से
घोंसले उजड़ते है ,
रिश्ते उजड़ते है ,
पंक्षी उजड़ते है ,
बच्चे उजड़ते है ,
जड़े भी तो उजडती हैं |
इस दुःख की घडी में
धरती खुद को सुखाती है ,
न रोती है
न बात करती है ,
खामोश बस खामोश रहती है |
और अब तेज़ हवायें
धरती को नंगा कर खुश होती हैं |
आओ ,इन्हें रोंके
धरती को सजाएँ ,
और इस सभ्यता के लोगो को
सभ्य करें मिलकर ,
ताकि ठंडी बयार चले ,
वृक्षों को नाच हो ,
पंक्षी भी बोले और नाचे
हवा भी नदी से अठखेलियाँ करे,
हरा-भरा खूब बड़ा आगन हो ,
और हम ये कह सकें
मित्रों,ये बहुत ही सभ्य सभ्यता के लोग हैं |
जुगल ......
बहुत होने लगे हैं इस जंगल में ,
रोने-सिसकने कि आवाजों से
जंगल सहमा-सहमा रहता है |
अटखेलियां करने वाले वृक्ष भी डरे हैं ,
किसी अनहोनी कि आशंका से
नदी भी चुप और उदास रहती है |
जंगल के सभी जीव-निर्जीव जीव
आपस में बतियाते है ,
कंकड ,पत्थर ,ईटों से सजे-धजे जंगलो से
मशीनों की आवाज़े,
आदमियों के बूटों की आवाज़ों आती हैं |
इन आदमियों के सर पर हेलमेट
और हाथों में भयानक औज़ार हैं,
ये सधे क़दमों से बढते आते हैं
हमारी ओर|
जंगल में सब आपस में पूछ्तें हैं
मित्रों,ये कौन सी सभ्यता के लोग हैं |
इन्होने उधर के जंगल खदेर दिए
उजाड दिये,
जहाँ भोर का सूरज पेडों से छनकर
धरती पर पड़ता था,
सूरज का सारा ताप वृक्ष सोख लेते थे ,
जहाँ सूरज का साम्रज्य बस नहीं पाया था ,
आज वहाँ सूरज का राज है |
आदमी तिलमिलाता है
सूरज की मार से
फिर भी जंगल को भगाता है ,
वृक्षों को भगाता है ,
जंगल से हर उस चीज़ को भगाता है ,
जो आदमी को सुख देती है ,
मित्रों ,ये कौन सी सभ्यता के लोग है |
लो ,
इन्होने घेर लिया हमें
मिटाने
उजाड़ने,
भगाने,
हमारे रिश्तों को खत्म करने ,
मित्रों ,ये कौन सी सभ्यता के लोग है |
जिन्हें ये भी नहीं मालूम
एक वृक्ष के गिरने से
घोंसले उजड़ते है ,
रिश्ते उजड़ते है ,
पंक्षी उजड़ते है ,
बच्चे उजड़ते है ,
जड़े भी तो उजडती हैं |
इस दुःख की घडी में
धरती खुद को सुखाती है ,
न रोती है
न बात करती है ,
खामोश बस खामोश रहती है |
और अब तेज़ हवायें
धरती को नंगा कर खुश होती हैं |
आओ ,इन्हें रोंके
धरती को सजाएँ ,
और इस सभ्यता के लोगो को
सभ्य करें मिलकर ,
ताकि ठंडी बयार चले ,
वृक्षों को नाच हो ,
पंक्षी भी बोले और नाचे
हवा भी नदी से अठखेलियाँ करे,
हरा-भरा खूब बड़ा आगन हो ,
और हम ये कह सकें
मित्रों,ये बहुत ही सभ्य सभ्यता के लोग हैं |
जुगल ......
Bahut achhi hai sir.
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