Thursday, 19 May 2011

स्मृतियाँ...

 मेरी स्मृतियों के
घने जंगल में तुम भी आ गये
खोये भी नहीं ,
भटके भी नहीं |

अब आये हो तो बैठो
बतियाते हैं |

कुछ बीते को उकेरतें हैं ,
कुछ जो बीतेगा उस पर सोचतें हैं ,
कुछ जो घट रहा है उसको सजाते है |

कुछ तुम्हारे
कुछ हमारे
शिकवे थे ज़िन्दगी से
उन मौसमों में
उन पलों से
जो साथ-साथ लड़ते -झगड़ते प्यार से कटते थे |

खैर ,

ज़िन्दगी
तुम्हारे साथ एक पहेली सी लगती थी |
कभी उसमे हम उलझते थे ,
कभी उसको सुलझा कर
दूर खड़े सोचते थे
सब कुछ तो सीधा और सच्चा है ,
कुछ भी उलझा नहीं |
लेकिन
केवल सोचते थे हम
और  दुसरे पल---
फिर उलझ जाते थे
और
एक बार तो ऐसा उलझे
फिर उलझते गये
और उलझते ,और उलझते .....
और उलझते गये हम |
अभी भी दूर खड़े
उलझे हुए
सोचते हैं
थोड़ा उलझे
शायद थोड़ा सुलझ गये हम|

इस उलझने में
एक बात ख़ास थी,
हम एक दूसरे के साथ थे |

उलझने में भी आदमी साथ -साथ रहता है |

तभी तो मेरी
स्मृतियों के घने जंगल में तुम
आज फिर आ गये |

ज़िन्दगी में
सिरों को सम्हाल कर रखा होता
तो उलझते न हम |
सिरों को पकड़ कर रखने से
उलझने सुलझती हैं |

अब आये हो
मेरी स्मृतियों के घने जंगल में
तो हम साथ- साथ रहते हैं इसमें
मिलकर ज़िन्दगी की पहेली को सुलझाते हैं |
सिरों को ढूढते हैं |

और

फिर से
अंत नहीं
शुरुआत करते हैं |

                                                                             जुगल .....|









4 comments:

  1. खूबसूरत अभियक्ति । मर्मस्पर्शी रचना । कौन नामुराद कहता है जुगल भाई की आप कवि नही हैं ?

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  2. 'तभी तो मेरी
    स्मृतियों के घने जंगल में तुम
    आज फिर आ गये '!!!!!!!!!!!

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  3. उलझे हुए
    सोचते हैं
    थोड़ा उलझे
    शायद थोड़ा सुलझ गये हम|
    इस उलझने में
    एक बात ख़ास थी,
    हम एक दूसरे के साथ थे |


    जुगलजी, जीवन का सारा सार इन पंक्तियों में आपने उड़ेल डाला है !
    आपको बधाई एक मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति के लिए
    कृपया लिखते रहिए
    कनक

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