मेरी स्मृतियों के
घने जंगल में तुम भी आ गये
खोये भी नहीं ,
भटके भी नहीं |
अब आये हो तो बैठो
बतियाते हैं |
कुछ बीते को उकेरतें हैं ,
कुछ जो बीतेगा उस पर सोचतें हैं ,
कुछ जो घट रहा है उसको सजाते है |
कुछ तुम्हारे
कुछ हमारे
शिकवे थे ज़िन्दगी से
उन मौसमों में
उन पलों से
जो साथ-साथ लड़ते -झगड़ते प्यार से कटते थे |
खैर ,
ज़िन्दगी
तुम्हारे साथ एक पहेली सी लगती थी |
कभी उसमे हम उलझते थे ,
कभी उसको सुलझा कर
दूर खड़े सोचते थे
सब कुछ तो सीधा और सच्चा है ,
कुछ भी उलझा नहीं |
लेकिन
केवल सोचते थे हम
और दुसरे पल---
फिर उलझ जाते थे
और
एक बार तो ऐसा उलझे
फिर उलझते गये
और उलझते ,और उलझते .....
और उलझते गये हम |
अभी भी दूर खड़े
उलझे हुए
सोचते हैं
थोड़ा उलझे
शायद थोड़ा सुलझ गये हम|
इस उलझने में
एक बात ख़ास थी,
हम एक दूसरे के साथ थे |
उलझने में भी आदमी साथ -साथ रहता है |
तभी तो मेरी
स्मृतियों के घने जंगल में तुम
आज फिर आ गये |
ज़िन्दगी में
सिरों को सम्हाल कर रखा होता
तो उलझते न हम |
सिरों को पकड़ कर रखने से
उलझने सुलझती हैं |
अब आये हो
मेरी स्मृतियों के घने जंगल में
तो हम साथ- साथ रहते हैं इसमें
मिलकर ज़िन्दगी की पहेली को सुलझाते हैं |
सिरों को ढूढते हैं |
और
फिर से
अंत नहीं
शुरुआत करते हैं |
जुगल .....|
घने जंगल में तुम भी आ गये
खोये भी नहीं ,
भटके भी नहीं |
अब आये हो तो बैठो
बतियाते हैं |
कुछ बीते को उकेरतें हैं ,
कुछ जो बीतेगा उस पर सोचतें हैं ,
कुछ जो घट रहा है उसको सजाते है |
कुछ तुम्हारे
कुछ हमारे
शिकवे थे ज़िन्दगी से
उन मौसमों में
उन पलों से
जो साथ-साथ लड़ते -झगड़ते प्यार से कटते थे |
खैर ,
ज़िन्दगी
तुम्हारे साथ एक पहेली सी लगती थी |
कभी उसमे हम उलझते थे ,
कभी उसको सुलझा कर
दूर खड़े सोचते थे
सब कुछ तो सीधा और सच्चा है ,
कुछ भी उलझा नहीं |
लेकिन
केवल सोचते थे हम
और दुसरे पल---
फिर उलझ जाते थे
और
एक बार तो ऐसा उलझे
फिर उलझते गये
और उलझते ,और उलझते .....
और उलझते गये हम |
अभी भी दूर खड़े
उलझे हुए
सोचते हैं
थोड़ा उलझे
शायद थोड़ा सुलझ गये हम|
इस उलझने में
एक बात ख़ास थी,
हम एक दूसरे के साथ थे |
उलझने में भी आदमी साथ -साथ रहता है |
तभी तो मेरी
स्मृतियों के घने जंगल में तुम
आज फिर आ गये |
ज़िन्दगी में
सिरों को सम्हाल कर रखा होता
तो उलझते न हम |
सिरों को पकड़ कर रखने से
उलझने सुलझती हैं |
अब आये हो
मेरी स्मृतियों के घने जंगल में
तो हम साथ- साथ रहते हैं इसमें
मिलकर ज़िन्दगी की पहेली को सुलझाते हैं |
सिरों को ढूढते हैं |
और
फिर से
अंत नहीं
शुरुआत करते हैं |
जुगल .....|
खूबसूरत अभियक्ति । मर्मस्पर्शी रचना । कौन नामुराद कहता है जुगल भाई की आप कवि नही हैं ?
ReplyDelete'तभी तो मेरी
ReplyDeleteस्मृतियों के घने जंगल में तुम
आज फिर आ गये '!!!!!!!!!!!
उलझे हुए
ReplyDeleteसोचते हैं
थोड़ा उलझे
शायद थोड़ा सुलझ गये हम|
इस उलझने में
एक बात ख़ास थी,
हम एक दूसरे के साथ थे |
जुगलजी, जीवन का सारा सार इन पंक्तियों में आपने उड़ेल डाला है !
आपको बधाई एक मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति के लिए
कृपया लिखते रहिए
कनक
sundar abhivyakti. vastavikta bayan karti hai.
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