मुझे बताया गया
वो ही सब कुछ है ,
तुम कुछ भी नहीं |
मुझे बताया गया
हम उसकी मर्ज़ी के बंदे हैं ,
हमारा -अपना कुछ भी नहीं ,
सब उसका है |
इधर -उधर
उधर -इधर
भटकता रहा मै
और
ये जानने की कोशिश करता रहा
कि
वो कौन है ?
और
मै कौन हूँ ?
क्यों कि किसी ने
ये भी कहा था कि
तुम्ही सब कुछ हो |
तुम्ही सब कुछ हो |
क्यों कि
तुम रचते हो इतिहास ,
तुम रचते हो दुनिया ,
तुम करते हो निर्माण
और तुम क्या भूल गए कि
तुम करते हो सृजन |
इस भटकने में
मैं ख़ुद को भुला बैठा था |
अपना इतिहास ही भूल बैठा था |
इसीलिए लोगो से पूछता रहा कि
मेरी शक्ल का क्या कोई व्यक्ति इधर से गुज़रा था ?
हाँ ,उसने इस सड़क पर
कई चक्कर काटे |
फिर मैं उनसे पूछता हूँ कि
कौन था वो ?
तब,उन लोगो कि भीड़ मे से
किसी ने कहा मुझ से ,
अरे ,
वो कोई और नहीं
तुम्ही तो थे |
मैंने फिर उससे पूछा
मैं कौन हूँ ?
उसने कहा ,
तुम,तुम्ही तो हो |
उसका जवाब
मेरी समझ से परे था |
सोचा ,
ख़ुद से पूछूं कि
मै कौन हूँ ?
और वो कौन है ?
जवाब मिला ,
जो दिखाई देता है
वो तुम हो |
जो नहीं दिखाई देता
वो ,वो है |
ओह !ये इक पहेली सा लगता है |
भटकता हूँ ,
इनसे-उनसे ,लोगो से
बार-बार पूछता हूँ कि
मै कौन हूँ ?
लोग चुप्पी साधे
मुझे देखते रहते हैं,
और
बस देखते रहते हैं
बोलते कुछ भी नहीं |
अपने अन्दर के मकड़जाल को काटकर
ख़ुद तक पहुँचने कि कोशिश करता हूँ |
शायद
वहाँ तक पहुँच कर
मै ये जान सकूँ कि
मै कौन हूँ ?
और
मै वो हो सकूँ ,जो मै हूँ |
और
ख़ुद तक पहुँचकर
ख़ुद से रूबरू हो सकूँ ,
ख़ुद को देख सकूँ कि
मैं हूँ क्या ?
और
मैं कौन हूँ ?
ख़ुद कि तलाश करता हूँ ....
जुगल
29-11-2011
वो ही सब कुछ है ,
तुम कुछ भी नहीं |
मुझे बताया गया
हम उसकी मर्ज़ी के बंदे हैं ,
हमारा -अपना कुछ भी नहीं ,
सब उसका है |
इधर -उधर
उधर -इधर
भटकता रहा मै
और
ये जानने की कोशिश करता रहा
कि
वो कौन है ?
और
मै कौन हूँ ?
क्यों कि किसी ने
ये भी कहा था कि
तुम्ही सब कुछ हो |
तुम्ही सब कुछ हो |
क्यों कि
तुम रचते हो इतिहास ,
तुम रचते हो दुनिया ,
तुम करते हो निर्माण
और तुम क्या भूल गए कि
तुम करते हो सृजन |
इस भटकने में
मैं ख़ुद को भुला बैठा था |
अपना इतिहास ही भूल बैठा था |
इसीलिए लोगो से पूछता रहा कि
मेरी शक्ल का क्या कोई व्यक्ति इधर से गुज़रा था ?
हाँ ,उसने इस सड़क पर
कई चक्कर काटे |
फिर मैं उनसे पूछता हूँ कि
कौन था वो ?
तब,उन लोगो कि भीड़ मे से
किसी ने कहा मुझ से ,
अरे ,
वो कोई और नहीं
तुम्ही तो थे |
मैंने फिर उससे पूछा
मैं कौन हूँ ?
उसने कहा ,
तुम,तुम्ही तो हो |
उसका जवाब
मेरी समझ से परे था |
सोचा ,
ख़ुद से पूछूं कि
मै कौन हूँ ?
और वो कौन है ?
जवाब मिला ,
जो दिखाई देता है
वो तुम हो |
जो नहीं दिखाई देता
वो ,वो है |
ओह !ये इक पहेली सा लगता है |
भटकता हूँ ,
इनसे-उनसे ,लोगो से
बार-बार पूछता हूँ कि
मै कौन हूँ ?
लोग चुप्पी साधे
मुझे देखते रहते हैं,
और
बस देखते रहते हैं
बोलते कुछ भी नहीं |
अपने अन्दर के मकड़जाल को काटकर
ख़ुद तक पहुँचने कि कोशिश करता हूँ |
शायद
वहाँ तक पहुँच कर
मै ये जान सकूँ कि
मै कौन हूँ ?
और
मै वो हो सकूँ ,जो मै हूँ |
और
ख़ुद तक पहुँचकर
ख़ुद से रूबरू हो सकूँ ,
ख़ुद को देख सकूँ कि
मैं हूँ क्या ?
और
मैं कौन हूँ ?
ख़ुद कि तलाश करता हूँ ....
जुगल
29-11-2011
मैं कौन हूँ ...खुद की तलाश में हूँ ... सर बहुत अच्छा है ....
ReplyDeleteमकड़ जाल तक पहुंचना ही बहुत कठिन है,
ReplyDeleteफिर उसे काटना तो आम इंसान के लिए नामुमकिन ही है !
जीवन की इस भटकन का अंत हो सका तो निर्वाण अवश्य मिलेगा
परन्तु यही तो वो मायाजाल है जिसमे हम भटकते ही रहते हैं
सबसे शक्तिशाली हो कर भी
सबसे कमज़ोर !
सुंदर रचना जुगल जी
बहुत ख़ूब जुगल भाई !
ReplyDelete"सोचा ,
ख़ुद से पूछूं कि
मै कौन हूँ ?
और वो कौन है ?
जवाब मिला ,
जो दिखाई देता है
वो तुम हो |
जो नहीं दिखाई देता
वो ,वो है |"
जो नहीं दिखाई देता, वह भी तुम ही हो !
न सुख है, न दुःख है, न दीन, न दुनिया, न इन्सान, न मज़हब
सिर्फ मैं हूँ, सिर्फ मैं, मैं .......... सिर्फ मैं !